हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर समस्त देशवासियों को राष्ट्राभिनंदन। मित्रों लगभग इकत्तालिस वर्ष से पत्रकारिता और साहित्य सेवा से हमारा जुड़ाव रहा है। प्रिंट मीडिया में साप्ताहिक बोलती दीवारें रीवा मप्र अपराध निरोधक टाइम्स दिल्ली के चीफ ब्यूरो अंतर्राज्यीय सीमा छेत्र १९९८मे साप्ताहिक प्रमोद एक्सप्रेस का प्रकाशन संपादक बतौर दैनिक कीर्ति क्रान्ति रीवा भोपाल ।दैनिक न्यायाधीश दैनिक अमृत प्रभात युनाइटेड भारत डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट भारतीय सहारा।और वर्तमान में दैनिक सहज स्वराज्य प्रयागराज से जुड़े हैं ।१९८८मे हमारी लिखी दहेज पर एक काव्य रचना सुनो दहेज़ प्रेमियों में नारी की पुकार है प्रकाशित हो चुकी है
: बदलते परिवेश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से स्मार्ट इंडिया न्यूज़ लाइव समाचार बेब चैनल व इसी नाम से यूट्यूब चैनल और देश के १५ प्रान्तो के १३००से ज्यादा मेम्बर से जुड़ा स्मार्ट इंडिया कुटुम्ब एप भी संचालित कर रहे हैं । अनुभव । गांव से नगर महानगर में निरंतर जुड़े हुए हैं दस्यु सरगना से लेकर मंत्री विधायक नेता ही नहीं श्मशान घाट के सैकड़ों मुर्दा जला चुके डोम तक का इन्टरव्यू लेकर प्रकाशित किया अनेक जन जागरण कार्यक्रम के सूत्रधार संचालन किये देश के अनेक प्रान्तों और नेपाल तक कवि सम्मेलन में कविता पाठ किये सम्मानित हुए ।अनेक लोगों को पत्रकारिता छेत्र से जोड़े अपने अंतर्राज्यीय पत्रकार संघ सहित दर्जनों पत्रकार संगठनों मे भी प्रमुख पदों पर रहे । ६३की उम्र में पत्रकारिता करते पैर के घुटने में चोट लगी और अभी पूरी तरह पैर काम नहीं कर रहा है । नं किसी नेता ने सरकारी तंत्र न कोई संगठन किसी का कोई सहयोग नहीं मिला। बुरे बक्त में घर परिवार और निजी ब्यवहार वाले साथियों का सहयोग और संबल मिला और मिल रहा है । मैं अपनी पत्रकारिता में अपने दायित्व निर्वहन में लगन व निष्ठा जन भावना का ध्यान रखा। ईश्वर की अनुकम्पा रही कि पैतृक सम्पत्ति से घर परिवार चल रहा है अधिकांशतः जीवन में जीवन के प्रति हम समय समय पर सतर्क रहे किन्तु ४० और ४१ वर्ष पत्रकारिता के बाद बगैर एक्सीडेंट ही फिसलने से पैर की कटोरी टूटी ६ ठा महीना चल रहा है अभी वैशाखी का सहारा है।आगे हम नये पत्रकारों को आज यह अवश्य सचेत करेंगे कि स्वयं को स्वयं की ही सेक्योरिटी से सुरक्षित कर पत्रकारिता करें क्योंकि अपने जीवन काल में हमने एक दो तीन नहीं बल्कि अनेक पत्रकार साथियों को समय से पहले दिवंगत होते देखा और मरने क बाद घर परिवार जनों को खोखली सहानुभूति मिली और अपार दुःख मिलरहा है। खासकर गांवों से जुड़े पत्रकारो को कहेंगे जब तक जीवित है हवा हवाई वाले स्वार्थी लोग झूठी तारीफ कर उत्तेजित कर अपना उल्लू तो सीधा करेंगे मगर कुछ मामला हुआं तो खुद झेलना पड़ता है ऐसे में सचेत रहें यहां जिन्दे के साथीसब है मुर्दा को कौन पूछेगा। पत्रकारिता करें खुद को बचाकर ही? अंत में हम हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर पुनः शुभकामना देते हैं मित्रों ये हमारा निजी अनुभव है (प्रमोद बाबू झा)
हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर वरिष्ठ पत्रकार के मन की बात
