जी हां जसरा मंडी बनी पानी का समंदर, करोड़ों का कारोबार डूबा—मंडी शुल्क वसूलने वाला तंत्र सुविधाएं देने में फेल! किसान की उपज से पल्लेदार की मेहनत तक जलभराव की मार, न जलनिकासी न सड़क न शौचालय ट्रांसफार्मर बंद, सचिव पर अवैध वसूली के आरोपों ने खड़े किए बड़े सवाल

जसरा, प्रयागराज। यमुनापार की प्रमुख नवीन सब्जी मंडी जसरा में बारिश ने केवल जलभराव नहीं किया, बल्कि मंडी प्रशासन की व्यवस्थाओं की पूरी तस्वीर सामने ला दी है। करोड़ों रुपये के दैनिक कारोबार का दावा करने वाली मंडी इन दिनों पानी, कीचड़ और अव्यवस्था के बीच जूझती नजर आ रही है। मंडी परिषद कार्यालय से लेकर कारोबार वाले हिस्सों और आवागमन के रास्तों तक जगह-जगह पानी भरा है। हालात ऐसे हैं कि किसान उपज लेकर पहुंच तो रहे हैं, लेकिन खरीद-बिक्री, माल ढुलाई और आवागमन पर जलभराव की सीधी चोट पड़ रही है। सवाल यह है कि जिस मंडी से राजस्व और मंडी शुल्क की वसूली होती है, वहां बरसात के मौसम में जलनिकासी की मुकम्मल व्यवस्था क्यों नहीं है? सबसे भयावह तस्वीर उन पल्लेदारों की है जो रोजाना भारी बोझ उठाकर मंडी में काम करते हैं। पचास किलोग्राम से लेकर एक क्विंटल तक वजन ढोने वाले श्रमिकों को फिसलन भरे कीचड़ और पानी के बीच आवाजाही करनी पड़ रही है। एक तरफ सिर पर भारी बोझ, दूसरी तरफ पैर रखने तक की सुरक्षित जगह नहीं। ऐसे में दुर्घटना की आशंका बनी हुई है। यदि कोई श्रमिक जलभराव के बीच फिसलकर घायल होता है तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी? जलभराव का असर सिर्फ श्रमिकों तक सीमित नहीं है। सब्जियों की गुणवत्ता पर भी इसका असर पड़ रहा है। लंबे समय तक पानी और कीचड़ के बीच खड़े वाहनों तथा उपज से नुकसान की आशंका बढ़ रही है। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलने में दिक्कत हो सकती है और व्यापारियों के कारोबार पर भी असर पड़ रहा है। यानी मंडी की अव्यवस्था का असर खेत से लेकर बाजार तक पहुंचने वाली पूरी आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ता दिखाई दे रहा है।

जलनिकासी पर सबसे बड़ा सवाल*

मंडी में नालियों और जलनिकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है। बारिश का पानी तेजी से बाहर निकलने के बजाय मंडी परिसर में जमा हो रहा है। रास्ते कीचड़ में बदल रहे हैं और पानी कई हिस्सों में जमा होकर आवागमन बाधित कर रहा है। आढ़तियों और व्यापारियों का कहना है कि समस्या कोई नई नहीं है। मंडी प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी दिए जाने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं हुआ। यहीं से मंडी प्रशासन की जवाबदेही का सवाल शुरू होता है। मंडी सचिव, मंडी समिति के जिम्मेदार अधिकारी, संबंधित अभियंता और मंडी परिषद के उच्चाधिकारियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मंडी परिसर में जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था के लिए अब तक क्या कार्य कराया गया? यदि कोई योजना बनी थी तो उसका बजट कितना था, कार्य किस संस्था या ठेकेदार को मिला, काम कब पूरा हुआ और उसका भौतिक सत्यापन किस अधिकारी ने किया?

मंडी शुल्क पूरा, सुविधा अधूरी क्यों?*

आढ़तियों का सबसे गंभीर सवाल मंडी शुल्क को लेकर है। उनका कहना है कि नियमानुसार शुल्क और अन्य मदों में राजस्व लिया जाता है, लेकिन बदले में बुनियादी सुविधाएं तक पर्याप्त नहीं हैं। यदि मंडी प्रशासन शुल्क वसूल रहा है तो किसानों, व्यापारियों और श्रमिकों के लिए सड़क, जलनिकासी, प्रकाश, स्वच्छता और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना उसकी जिम्मेदारी से अलग कैसे हो सकता है? मंडी की सड़कों की स्थिति भी सवालों में है। पक्के और सुचारु मार्ग का अभाव बारिश में और गंभीर हो जाता है। जलभराव के बीच वाहनों की आवाजाही मुश्किल हो रही है। माल से लदे वाहनों के आवागमन में परेशानी होने से कारोबार की गति प्रभावित होने की बात व्यापारी बता रहे हैं।

पांच साल पहले बना शौचालय, आज भी उपयोग का इंतजार!*

मंडी परिसर में करीब पांच वर्ष पहले तैयार कराया गया शौचालय भी अब जांच का विषय बन गया है। आरोप है कि निर्माण के बावजूद इसका नियमित उपयोग नहीं हो पा रहा है। यदि सरकारी धन से शौचालय का निर्माण कराया गया था तो उसके निर्माण की लागत, कार्यदायी संस्था, पूर्णता प्रमाणपत्र, हस्तांतरण की प्रक्रिया और उपयोग में नहीं आने के कारणों की जांच जरूरी है। किसान, व्यापारी और पल्लेदारों के लिए शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा का उपलब्ध न होना सीधे तौर पर मंडी की स्वच्छता व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। यदि भवन तैयार है तो वह चालू क्यों नहीं है और यदि उसमें तकनीकी अथवा अन्य कमी है तो वर्षों से उसे दूर क्यों नहीं किया गया?

एक महीने से ट्रांसफार्मर खराब, अंधेरे में कारोबार*

बिजली व्यवस्था की हालत भी मंडी की बदहाली को और गंभीर बना रही है। कारोबारियों के मुताबिक मंडी परिसर का ट्रांसफार्मर करीब एक महीने से खराब है। बारिश के मौसम में बिजली की समस्या का मतलब केवल रोशनी का अभाव नहीं, बल्कि सुरक्षा और कारोबार दोनों पर असर है। व्यापारियों का आरोप है कि सूचना के बावजूद ट्रांसफार्मर बदलने में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई गई। अब विद्युत विभाग के संबंधित अधिकारियों से भी सवाल होना स्वाभाविक है कि खराब ट्रांसफार्मर की सूचना कब मिली, शिकायत दर्ज हुई या नहीं, विद्युत विभाग ने क्या कार्रवाई की और नया ट्रांसफार्मर लगाने में देरी की वजह क्या रही?

सचिव पर अवैध वसूली के आरोप—जांच हुई तो खुलेगा असली हिसाब!*

मंडी सचिव की कार्यप्रणाली को लेकर भी व्यापारियों और आढ़तियों में नाराजगी सामने आ रही है। कुछ आढ़तियों ने सचिव पर अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगाए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, इसलिए इनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद स्थिति साफ होगी और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल मंडी की अव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजस्व और प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर विषय बन जाएगा। जांच का दायरा केवल आरोप लगाने वाले और आरोपी तक सीमित नहीं होना चाहिए। मंडी में पिछले वर्षों में हुई शुल्क वसूली,रसीदों, आवंटित दुकानों और आढ़तों, विकास कार्यों, मरम्मत कार्यों, जलनिकासी, सड़क, प्रकाश व्यवस्था, शौचालय निर्माण और विद्युत व्यवस्था से जुड़े अभिलेखों की भी जांच की जानी चाहिए।

*अब जांच हो तो कई सवालों के जवाब सामने आएंगे*

जिलाधिकारी प्रयागराज, मंडी परिषद के उच्चाधिकारी, संबंधित मंडी समिति के अधिकारी, उपजिलाधिकारी बारा, तहसील प्रशासन, लोक निर्माण विभाग, विद्युत विभाग और संबंधित तकनीकी अधिकारियों को संयुक्त रूप से मौके का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति दर्ज करनी चाहिए। जलनिकासी व्यवस्था की तकनीकी जांच, नालियों की क्षमता, जलनिकासी के प्राकृतिक मार्ग, सड़क निर्माण की गुणवत्ता, शौचालय की स्थिति और बिजली व्यवस्था की जांच अलग-अलग कराई जाए। साथ ही मंडी शुल्क से प्राप्त राजस्व और उसके सापेक्ष मंडी परिसर में कराए गए विकास कार्यों का मिलान कराया जाना भी जरूरी है। यदि सड़क, नाली, शौचालय या अन्य सुविधाओं के लिए सरकारी धन स्वीकृत हुआ है तो स्वीकृति से लेकर भुगतान और कार्य पूर्ण होने तक पूरे रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जसरा नवीन सब्जी मंडी में बारिश हर साल अचानक आती है या व्यवस्था हर साल जानबूझकर बारिश का इंतजार करती है? करोड़ों के कारोबार वाली मंडी यदि कुछ घंटों की बारिश में पानी और कीचड़ के बीच फंस जाती है, तो यह केवल मौसम की समस्या नहीं बल्कि तैयारी और प्रबंधन की परीक्षा है। किसान अपनी फसल लेकर मंडी पहुंचता है, व्यापारी शुल्क और अन्य देयताओं का भुगतान करता है और पल्लेदार अपना पसीना बहाकर माल ढोता है। बदले में यदि उसे पानी, कीचड़, अंधेरा और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव मिले तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। अब निगाह जिला प्रशासन और मंडी परिषद के उच्चाधिकारियों पर है। क्या मौके पर जांच होगी? क्या जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था बनेगी? क्या वर्षों पुराने शौचालय को चालू कराया जाएगा? क्या खराब ट्रांसफार्मर तत्काल बदलेगा? क्या सड़क और नालियों की तकनीकी जांच होगी? और सबसे महत्वपूर्ण—मंडी सचिव पर लगाए गए अवैध वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी? जसरा मंडी का जलभराव अब सिर्फ पानी का मामला नहीं रहा; यह राजस्व, व्यवस्था, जवाबदेही और सरकारी दावों की वास्तविक परीक्षा बन चुका है।

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