बाहुवली विजय मिश्रा की कहानी? विभिन्न श्रोतो से संकलित जानकारी पर आधारित  

स्मार्ट इन्डिया न्यूज यूपी डेस्क/ वेदप्रकाश खन्ने।

कौन है विजय मिश्रा? ब्राह्मणों को ही निशाना बनाकर बना पूर्वांचल का बाहुबली, अब मिट्‌टी में मिला आपराधिक साम्राज्य पूर्वांचल की आपराधिक जमीन पर विजय मिश्रा ने अपना अलग साम्राज्य खड़ा किया था। ब्राह्मणों को ही निशाना बनाकर बाहुबली बना। अब अपराध का साम्राज्य मिट्टी में मिला गया है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से निकलकर पूर्वांचल की राजनीति में कई दशक तक सक्रिय रहे बाहुबली पूर्व विधायक विजय मिश्रा के खिलाफ कोर्ट का फैसला सामने आया है। भदोही जिले की ज्ञानपुर सीट से विधायक रहे विजय मिश्रा और उसका परिवार अपराधिक घटनाओं को लेकर चर्चा में रहा है। कोर्ट के फैसले के बाद पिछले दिनों में एक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की जा रही है। इसमें विजय मिश्रा को जाति विशेष के कारण निशाना बनाए जाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, योगी आदित्यनाथ सरकार ने साफ किया है कि कोर्ट के फैसले, जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और दशकों से दर्ज आपराधिक मुकदमे इस दावे की सच्चाई को पूरी तरह खारिज करते हैं। सबसे बड़ी बात है कि विजय मिश्रा कोई ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ का शिकार नहीं, बल्कि कानून का दोषी ठहराया गया एक सफेदपोश माफिया है। उसने राजनीतिक ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल कर वर्षों तक अपराध का समानांतर तंत्र खड़ा किया।

बाहुबली विजय मिश्रा के खिलाफ एक्शन की लगातार हो रही है चर्चा

अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस
विजय मिश्रा पर कार्रवाई को कुछ लोग ‘ब्राह्मण उत्पीड़न’ का रंग देने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, सरकार का साफ संदेश है कि अपराधी कोई भी हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। विजय मिश्रा के खिलाफ भी कार्रवाई अदालतों के फैसलों और जांच एजेंसियों के सबूतों के आधार पर हुई है। उसके खिलाफ दर्ज मामलों में पीड़ितों में बड़ी संख्या ब्राह्मण समाज के लोगों की ही रही है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार लगातार यह संदेश देती रही है कि अपराध और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में जाति, धर्म, मत, मजहब या राजनीतिक पहचान नहीं देखी जाएगी।
योगी सरकार ने साफ किया है कि राज्य में माफिया और संगठित अपराध के खिलाफ चलाए गए अभियानों में विभिन्न जातियों और समुदायों से जुड़े अपराधियों पर समान रूप से कार्रवाई हुई है। विजय मिश्रा का मामला भी इसी नीति का हिस्सा है, जहां दशकों से लंबित मामलों में अदालतों के जरिए सजा सुनिश्चित हुई।

प्रकाश नारायण पांडे हत्याकांड
विजय मिश्रा ने ब्राह्मणों के खिलाफ क्राइम की घटनाओं के जरिए अपना आपराधिक साम्राज्य खड़ा इसका बड़ा उदाहरण प्रकाश नारायण पांडे हत्याकांड है। 11 फरवरी 1980 को प्रयागराज जिला अदालत परिसर में प्रकाश नारायण पांडे की हत्या कर दी गई थी। प्रकाश नारायण पांडे एक विश्वविद्यालय के छात्र थे, जो एक मामले में जमानत लेने अदालत आए थे। इस मामले में विजय मिश्रा को मई 2026 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।

प्रकाश नारायण पांडे हत्याकांड की प्राथमिकी मृतक के बड़े भाई श्याम नारायण ने दर्ज कराई थी। हाल ही में प्रयागराज की विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने विजय मिश्रा को 46 साल पुराने इस हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

कृष्ण मोहन तिवारी उर्फ ‘मुन्ना’ की कब्जाई संपत्ति
विजय मिश्रा के पतन की शुरुआत उसके अपने ही एक रिश्तेदार कृष्ण मोहन तिवारी उर्फ मुन्ना की शिकायत से हुई। अगस्त 2020 में, कृष्ण मोहन तिवारी ने आरोप लगाया कि मिश्रा और उसके परिवार ने उनकी पैतृक संपत्ति (लगभग 50 बीघा जमीन और एक बड़ा घर) पर जबरन कब्जा कर लिया है और उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। इस मामले में मई 2026 में विजय मिश्रा, उसकी पत्नी और बेटे को 10-10 साल की, जबकि बहु को 4 साल जेल की सजा सुनाई गई है।
विपुल दुबे की बड़ी भूमिका
विजय मिश्रा की राजनीतिक पकड़ कमजोर करने में विपुल दुबे का नाम महत्वपूर्ण है। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, निषाद पार्टी ने विजय मिश्रा को टिकट देने से इनकार कर दिया और उनकी जगह विपुल दुबे को ज्ञानपुर सीट से अपना उम्मीदवार बनाया। विजय मिश्रा ने जेल से चुनाव लड़ा लेकिन वह तीसरे स्थान पर रहे, जिससे उनकी दशकों पुरानी राजनीतिक सत्ता का अंत हुआ।

दरअसल, लोक अभियोजक प्रवेश तिवारी ने विजय मिश्रा और उसके परिवार के खिलाफ संपत्ति कब्जाने वाले मामले में प्रभावी ढंग से पैरवी की, जिससे उनकी सजा सुनिश्चित हुई। वहीं जिला सरकारी अधिवक्ता दिनेश पांडे ने भी विजय मिश्रा के खिलाफ बलात्कार और अन्य आपराधिक मामलों में अभियोजन का नेतृत्व किया था।

गैंगरेप केस में भी दोषी
नवंबर 2023 में वाराणसी की अदालत ने एक महिला लोकगायिका के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले में विजय मिश्रा को 15 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि एक जनप्रतिनिधि की ओर से ऐसा अपराध समाज के विश्वास के साथ विश्वासघात है। यह फैसला केवल एक व्यक्ति की सजा नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग पर न्यायपालिका की कठोर टिप्पणी भी था।

नंदी बम ब्लास्ट में नाम
विजय मिश्रा का नाम 2010 में तत्कालीन मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ पर हुए रिमोट कंट्रोल बम हमले के मामले में भी सामने आया था। इस हमले में दो लोगों की मौत हुई थी। यह मामला उस दौर के अपराध-राजनीति गठजोड़ की गंभीरता को भी उजागर करता है।

मनी लॉन्ड्रिंग, करोड़ों की संपत्ति
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में सामने आया कि विजय मिश्रा और उसके परिवार ने कथित तौर पर अपराध से अर्जित धन को वैध बनाने के लिए कंपनियों और बेनामी निवेश का सहारा लिया। जांच एजेंसी ने दिल्ली, मुंबई, प्रयागराज और रीवा में करोड़ों रुपये की संपत्तियां कुर्क की हैं। सतर्कता जांच में भी यह पाया गया कि घोषित आय की तुलना में मिश्रा परिवार ने कई गुना अधिक संपत्ति अर्जित की। यह पूरा पैटर्न उस ‘सफेदपोश माफिया मॉडल’ को दर्शाता है जिसमें राजनीति, पैसा और अपराध एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।
अपराध-राजनीति का गठजोड़ विजय मिश्रा
विजय मिश्रा सपा-बसपा और कांग्रेस के दौर की राजनीति का वह चेहरा था जहां बाहुबल, भय, दबाव और नेटवर्क के सहारे सत्ता और संपत्ति दोनों अर्जित किए जाते थे। विधायक रहने के दौरान उस पर हत्या, रंगदारी, अवैध कब्जा, धोखाधड़ी, अपहरण, जालसाजी, अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोप लगातार लगते रहे। उसके और उसके सहयोगियों के खिलाफ उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल में 80 से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हैं।
सरकार का कहना है कि विजय मिश्रा की कार्यप्रणाली सामान्य अपराधी जैसी नहीं थी। वह कथित तौर पर राजनीतिक संरक्षण, आर्थिक नेटवर्क और दबंगई के सहारे बड़े अपराधों को अंजाम देता था भदोही ज्ञानपुर के पूर्व विधायक विजय मिश्र को 46 साल पहले 11 feb 1980 मे किये गए प्रकाश नारायण पाण्डेय की हत्या मे आजीवन कारावास हो गया है, तबसे भदोही मे माहौल गरमाया हुआ है, फिर से उदयभान सिँह उर्फ़ डॉक्टर साहब का उदाहरण दिया जा रहा की अगर वो बाहर हो सकते है तो विजय मिश्रा क्यों नहीँ, सरकार अन्याय कर रही ब्राह्मणो के साथ |आइये फिर शुरू से समझते है इस पूरी कहानी को की अखिर कैसे कालीन नगरी भदोही क्षत्रिय VS ब्राह्मण अदावत का अखाडा बन गया था | ध्यान रहे ये कहानी कोई गांधीवादी नेताओं की नहीँ है बल्कि 2 बाहुबलियो की है |

भदोही जिला पहले बनारस जिले का ही भाग था जिसे 1994 मे काटकर अलग जिला बनाया गया था , भदोही चारो तरफ से 4 जिलों मिर्ज़ापुर बनारस इलाहबाद जौनपुर से घिरा हुआ छोटा सा जिला है, यहां कालीन का काम कभी बहुतायत मे था, यहां की कालीन देश विदेशो मे जाती थी इसीलिए इसे कालीन नगरी भी कहा जाता था, अभी भी कालीन का काम होता है लेकिन अब वो वाली बात नहीँ रही

खैर आते है मुख्य मुद्दे पे, मिर्ज़ापुर और भदोही मे क्षत्रिय आबादी कम तो थी लेकिन ठेकेदारी और बाहुबल मे वो सबसे आगे थे, मिर्ज़ापुर मे तो इनमे आपस मे काफ़ी गैंगवार हुआ है, 2 दर्जन के करीब जाने गई है, मिर्ज़ापुर और भदोही क्षत्रिय माफियाओ का अखाडा था |

मिर्ज़ापुर मे ही एक बड़ा दबँग क्षत्रियो का गांव है सेमरा, ये गांव भदोही जिले के पास का क्षेत्र है, इसी गांव के व्यक्ति है उदयभान सिंह उर्फ़ डॉक्टर साहब |

अब इस कहानी के दूसरे किरदार है विजय मिश्रा जो की हंडिया इलहाबाद के खक्टिहा गांव के है |
यानी जिन 2 लोगो के कारण भदोही क्षत्रिय vs ब्राह्मण का अखाडा बना वो दोनों ही भदोही के नहीँ है, एक मिर्ज़ापुर तो एक इलाहबाद के है |

अब आते है उस मुद्दे पर जिसने भदोही मे क्षत्रिय vs ब्राह्मण की नींव रखी |

भदोही मे एक ब्लॉक है डीघ ब्लॉक, इस ब्लॉक मे ब्राह्मण की आबादी बहुतायत मे है | 2 बार से ब्लॉक प्रमुख अभयराज सिँह बन रहे थे जबकि सदस्यों की संख्या मे 70% ब्राह्मण थे, ब्राह्मणो को ये बात खल रही थी की उनके बाहुल्य क्षेत्र से भी वो नहीँ जीत रहे, 1986 मे जीत के बाद कोइरौना चौराहे पर अभय राज सिँह के समर्थको ने नारे लगाए गए और सम्भवतः नारों मे ये कहा गया की “सरकार किसी की बने डीघ ब्लॉक मे हमारी चलेगी “, ये नारा ब्राह्मणो को काफ़ी अपमान जनक लगा |
अब इस अपमान का बदला लेने और क्षत्रियो को बाहुबल मे टक़्कर देने के लिए ऐसे ब्राह्मण की खोज शुरू हुई जो दबँग हो, कांग्रेस के नेता रामश्रृंगार चौबे और वंशनारायण मिश्रा ने एक लडके को खोजा जिसका नाम था विजय मिश्रा | विजय मिश्रा वही है जो इलहाबाद के छात्र प्रकाश नारायण पाण्डेय की जिला कचहरी मे हत्या कर चुके थे और उसके बाद वो कलकत्ता मे भी लूट के आरोपी थे, वो इलहाबाद छोड़कर भदोही आ चुके थे और एक बड़े कालीन कंपनी के मालिक के बॉडीगार्ड या कहे गनर बन चुके थे, एक बार कालीन मालिक के ऊपर जानलेवा हमला हुआ था जिसमे विजय मिश्रा ने अपनी जान पर खेलकर कंपनी के मालिक को बचाया था जिसके चलते विजय मिश्रा उसके चहेते बन गए थे और जल्द वो ट्रक और पेट्रोल पम्प के मालिक बन चुके थे |

अब ज़ब कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें आगे बढ़ाना शरू किया तब विजय मिश्रा बनारस निवासी उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री और रेलवे मंत्री कमलापति त्रिपाठी के सम्पर्क मे आये, कमलापति जी उस समय ब्राह्मणो के बड़े हितेषी और सर्वमान्य नेता थे, यहां ये बताना जरूरी है की कमलापति त्रिपाठी को CM पद से हटाया ही इसलिए गया था की उन पर अत्यधिक ब्राह्मणवाद का आरोप लगा था |

कमलापति त्रिपाठी के शिष्य बन जाने के कारण जल्द ही विजय मिश्रा पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी व पूर्व मुख्यमंत्री नारायण तिवारी व बाहुबली विधायक हरिशंकर तिवारी के सम्पर्क मे आये, धीरे धीरे विजय मिश्रा का भी ग्राफ बढ़ने लगा |

उधर दूसरी तरफ मिर्ज़ापुर सेमरा गांव निवासी उदयभान सिँह की तुती मिर्ज़ापुर सोनभद्र भदोही और जौनपुर के लगते हुऐ हिस्से मे बोलने लगी थी, इस बेल्ट के खनन, ठेकेदारी, बाहुबल मे उदयभान सिँह उर्फ़ डॉक्टर साहब का एकतरफा बोल बाला चल रहा था |

फिर आया साल 1990 ब्लॉक प्रमुखी का चुनाव, इस बार डीघ ब्लॉक से 2 बार से लगातार जीत रहे अभयराज सिँह के खिलाफ कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं ने विजय मिश्रा को उतार दिया | जमकर जोर आजमाइश चली और अंततः विजय मिश्रा ने अभयराज सिँह को चुनाव हरा दिया और इसी के साथ भदोही की राजनीती मे विजय मिश्रा का उदय हुआ और भदोही मे समाजिक रूप से क्षत्रिय vs ब्राह्मण का दौर शुरू हो गया |नोट। विभिन्न श्रोतो से संकलित जानकारी पर आधारित

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